भारत की शहरी क्षेत्र संबंधी रूप रेखा

Submitted by niuaadmin on 12 जनवरी 2016 - 4:45pm
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शहरी भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक सुधारों, उदारीकरण तथा वैश्‍वीकरण के युग में शहर तथा कस्‍बे घरेलू एवं अंतर्राष्‍ट्रीय निवेशों के केन्‍द्रों के रूप में उभर रहे हैं। इसका कारण मुख्‍यतया संकुलन की उनकी विशेषताएं तथा निवेश की अर्थव्‍यवस्‍थाएं हैं। ये शहर औद्योगिक तथा वाणिज्यिक कार्यकलापों के केन्‍द्र एवं सरकार के शासन क्षेत्र रहें हैं। इसके अतिरिक्‍त, शहरी स्‍थानों पर आधुनिक शैक्षणिक, स्‍वास्थ्य तथा पर्यावरण संबंधी सुविधाएं नितांत प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध हैं। क्षमता के भंडार होने के नाते वे विविध विशिष्‍ट सेवाएं प्रस्‍तुत करती हैं जिनमें विधिक, वित्‍तीय, विपणन, बैंकिंग, बीमा आदि शामिल हैं। भीड़-भाड़ युक्‍त अपमितव्‍ययिता तथा शहरी जीवन के जोखिमपूर्ण होने के बावजूद शहरी कार्य उत्‍पादक बना हुआ है। वास्‍तव में अनुमान यह दर्शाते हैं कि फिलहाल शहरी भारत देश के सकल घरेलू उत्‍पाद के 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है हालांकि इसमें इसकी एक-तिहाई जनसंख्‍या शामिल है। इसी पृष्‍ठभूमि में शहरी विकास नीति में एक ऐसे दृष्टिकोण की अपेक्षा है जो शहरीकरण के नकारात्‍मक प्रभावों को कम अथवा दूर करते हुए शहरों तथा कस्‍बों की उत्‍पादक विशेषताओं का इष्‍टतम लाभ उठाएँ।